भारत, विविधता का देश, जहाँ हर धर्म और संस्कृति का अपना महत्व है, आज एक कठिन समय से गुजर रहा है। हाल के दिनों में, विभिन्न राज्यों में धार्मिक जुलूसों पर पत्थरबाजी की घटनाएँ तेजी से बढ़ रही हैं। राजस्थान के भीलवाड़ा, कर्नाटक और गुजरात में हुए हालिया घटनाक्रम इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। इन घटनाओं ने समाज में गहरी चिंता और असहिष्णुता को उजागर किया है।
भीलवाड़ा में, मस्जिद से हिंदू जुलूस पर पत्थर फेंके गए, जिससे कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। यह घटना एक बार फिर धार्मिक असहमति और सांप्रदायिक तनाव को दर्शाती है। कर्नाटक में गणेश विसर्जन के दौरान पत्थरबाजी की गई और इसे प्रणाली की विफलता के रूप में देखा गया। गुजरात के कच्छ में गणेश प्रतिमा पर हमले और मंदिर पर हरी झंडी फहराने की घटनाओं ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है।
ये घटनाएँ एक ही दिशा की ओर इशारा करती हैं - धार्मिक असहिष्णुता और सांप्रदायिक भेदभाव। इस संदर्भ में, गांधी जी के "तीन बंदर" की उपमा अत्यंत प्रासंगिक है। गांधी जी के तीन बंदर - "देखो मत, सुनो मत, बोलो मत" - आज समाज में पूरी तरह से लागू हो गए हैं। जब किसी एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के लोगों पर हमला करते हैं, तो इसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। इसके विपरीत, अगर वही हमला किसी और धर्म से जुड़ी घटना में होता है, तो तुरंत कार्रवाई की जाती है।
इस प्रकार, समाज में एक असमानता का भाव उत्पन्न हो जाता है, जहाँ एक धर्म की हिंसा को सामान्य समझा जाता है और दूसरी ओर, उसे अत्यधिक बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता है। यह स्थिति, समाज की एकता और शांति को संकट में डालती है।
समाज को इस वास्तविकता को समझना और स्वीकार करना होगा कि सभी धर्मों और संस्कृतियों के प्रति सम्मान और सहिष्णुता आवश्यक है। हमें सभी धर्मों के बीच समानता और समझ बढ़ानी होगी और सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ कड़े कदम उठाने होंगे। केवल इसी तरह हम एक समरस और शांतिपूर्ण समाज की ओर बढ़ सकते हैं जहाँ हर धर्म और संस्कृति को समान मान्यता मिले।
अगर हम सचमुच एक सशक्त और समृद्ध भारत चाहते हैं, तो हमें धार्मिक भेदभाव और असहिष्णुता के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना होगा। गांधी जी के "तीन बंदर" की उपमा के माध्यम से हमें समझना होगा कि चुप्पी और उदासीनता इस समस्या का समाधान नहीं है। केवल जब हम सामूहिक प्रयास करेंगे, तभी हम एक सशक्त और शांतिपूर्ण समाज की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।
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